प्रेरक प्रसंग

*प्रेरक प्रसंग*
(बाल्मीकीय रामायण से)
एकबार अपने बडे बड़े योद्धाओँ को युद्ध मे मरते देखकर रावण स्वयं ही युध्द के लिये रणक्षेत्र में आ गया।श्री राम ने सोचा कि अभी तो अनेकों योध्दा बचे हैं।रावण पहले ही युध्द के लिये आ गया।लेकिन आ ही गया है तो मुझे युध्द के लिये जाना ही पड़ेगा ।इस तरह राम और रावण का युद्ध प्रारंभ हुआ।राम ने अपने वाणो प्रहार से रावण के रथ कों नष्ट कर दिया। उसके अस्त्र शस्त्रों को काट दिया।अब रावण को लगा कि शायद राम का अगला वाण उसके सीने को चीर देगा।
तभी उसने अपनी आंखें बंद कर लीं। थोड़ी देर बाद आंखें खोलकर देखा तो श्रीराम उसके सामने खड़े हुये हैं। श्रीराम कहने लगे कि हे रावण! जाओ फिर से अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित होकर रथ पर सवार होकर आओ। मैं निहत्थों पर वार नहीं करता।
रावण जीवनदान लेकर जब महल में वापस गया तो छत पर टहलते हुए उसने मंदोदरी से पूछा कि मंदोदरी! लोग कहते हैं कि भाई हो तो राम जैसा?
मंदोदरी ने कहा कि हां भाई हो तो राम जैसा हो।
फिर पूछा कि लोग कहते हैं कि पुत्र हो तो राम जैसा?
मंदोदरी ने कहा हां लोग यही कहते हैं कि पुत्र हो तो राम जैसा।
फिर पूछा लोग यह भी कहते हैं कि मित्र हो तो राम जैसा?
मंदोदरी ने कहा हां महाराज लोग यह भी कहते हैं कि मित्र हो तो राम जैसा ही हो।
रावण ने मंदोदरी से कहा कि मंदोदरी आज मैं भी एक बात कहता हूँ कि शत्रु हो तो वो भी राम जैसा हो।
मैं राम जैसे शत्रु को पाकर आज गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ।

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