एक बार तो सोच

एक बार तो सोच


कोई एहसासों को भी छुपा लेता है मगर ,
एसा सख्स अकेले मैं बहुत रोता है.
नहीं ज़ाहिर कर पता अपना दिले दर्द,
एसा ही कुछ मेरे साथ अक्सर होता है.
बड़ी चट्टानों को देखकर सोचता हूँ मैं इस कदर
कैसे कोई तूफाओं को भी अपना बना लेता है.
बड़े समंदर के सामने वो बड़ा सा महल,
जब मचलने पे आ जाये , तो महलो को भी ढहा देता है.
नहीं मुमकिन कई चीज़ें , कई बातें कई मुकाम
माँ की ममता या अपनों का प्यार,कहाँ कोई खरीद लेता है?
बड़ा कमाया है तूने ओ बन्दे , इतरा मत
एसा खजाना भी क्या , जो प्यार के खजाने को बहा देता है .
तू तून्फानो से आँखे मिलाने की कोसिस कर,
कभी कभी एक झोंका भी हवा का, महलों को उडा देता है.
तू  दरिया को तैर कर पार करने का रख हौंसला
तैर पाएगा, क्यों तू मल्लाहों की शरण लेता है?
बड़ी देर ना हो जाये ये समझने मैं , ए बन्दे
अभी भी वक़्त है थमने का, खुद को क्यों सजा देता है?
कलेवा भी फूंक कर देती है माँ अक्सर अपने बच्चे को,
तू क्यों भुजे हुए  अंगारों को हवा देता है.
बड़े किस्मत वाले हैं वो लोग ,जिन्हें अपने नसीब हो पाते हैं
नेकी कर , पाक रह , परवरदिगार भी नेक बन्दे को पनाह देता है.

नेकी कर , खुदा से डर , मोहमाया को त्याग , अपनों का बन , खुदा तुझसे मिलने खुद आयेंगे……. 

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